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सरहदें बँटीं, शिक्षा नहीं : श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल, हाफ़िज़ाबाद (पाकिस्तान) से डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल, पानीपत तक अमर विरासत ।

📅 29 Sep 2026

सरहदें बँटीं, शिक्षा नहीं : श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल, हाफ़िज़ाबाद (पाकिस्तान) से डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल, पानीपत तक  अमर विरासत ।
सरहदें बँटीं, शिक्षा नहीं : श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल, हाफ़िज़ाबाद (पाकिस्तान) से डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल, पानीपत तक अमर विरासत । सरहदें देशों को बाँट सकती हैं, लेकिन शिक्षा की विरासत को नहीं। श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल से डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल तक की यात्रा इसी अमर सत्य की प्रेरक कहानी है। विभाजन की त्रासदी के बाद भी कपूर परिवार ने शिक्षा की उस ज्योति को बुझने नहीं दिया, जो आज भी हजारों विद्यार्थियों के जीवन को ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र सेवा के मूल्यों से आलोकित कर रही है। वर्ष 1945-46 में, अविभाजित भारत के हाफ़िज़ाबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में राय बहादुर डॉ. महाराज कृष्ण कपूर ने अपनी पूज्य माता श्रीमती हरकौर की पावन स्मृति में श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल की स्थापना की। उस समय, जब बालिका शिक्षा को समाज में अपेक्षित महत्व प्राप्त नहीं था, तब यह विद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि नारी शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के व्यापक प्रसार का एक दूरदर्शी अभियान था। बेटियों के हाथों में पुस्तक देना उस युग में केवल शिक्षा नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का संकल्प था। फिर आया 1947 का भारत-विभाजन। परिस्थितियों ने कपूर परिवार को अपनी जन्मभूमि और अपने हाथों से स्थापित उस ऐतिहासिक विद्यालय से दूर कर दिया। विद्यालय की इमारत हाफ़िज़ाबाद में रह गई, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य, सेवा का संस्कार और समाज के प्रति समर्पण उनके हृदय में सुरक्षित भारत की धरती तक साथ चला आया। सीमाएँ बदल गईं, पर शिक्षा के प्रति उनकी आस्था कभी नहीं बदली। भारत आने के बाद हरियाणा के पानीपत में कपूर परिवार ने लोगों के अनुरोध पर अपने इस अधूरे स्वप्न को पुनः साकार करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपनी पूज्य माता की स्मृति को जीवित रखते हुए माता हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल की स्थापना की। समय के साथ यही संस्थान निरंतर विकसित होकर आज डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल के रूप में शिक्षा, संस्कार और उत्कृष्टता का एक प्रतिष्ठित केंद्र बन चुका है। यह केवल एक विद्यालय की स्थापना नहीं थी, बल्कि उस शिक्षा-ज्योति का पुन र्प्रज्ज्वलन था, जिसे विभाजन की त्रासदी भी बुझा नहीं सकी। विशेष उल्लेखनीय है कि आज भी यह विद्यालय हाफ़िज़ाबाद (पाकिस्तान) में पाकिस्तान सरकार के अधीन एक सरकारी विद्यालय के रूप में संचालित हो रहा है, किंतु इसकी ऐतिहासिक पहचान 'श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल' आज भी बनी हुई है एवं यह नाम आज भी विद्यालय के मुख्य भवन के द्वार पर अंकित हैl आज पाकिस्तान का श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल और भारत का डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल एक ही महान शैक्षिक विरासत के दो जीवंत प्रतीक हैं। इतिहास ने दोनों देशों के बीच सीमाएँ अवश्य खींच दीं, किन्तु शिक्षा, संस्कार, सेवा और मानवीय मूल्यों की यह विरासत आज भी दोनों देशों को एक अदृश्य भावनात्मक सूत्र में जोड़ती है। यह इतिहास का वह अध्याय है जो बताता है कि सरहदें भूमि को बाँट सकती हैं, लेकिन शिक्षा के आदर्शों, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को कभी विभाजित नहीं कर सकती l यह ऐतिहासिक विरासत हमें यह भी सिखाती है कि राष्ट्र का निर्माण केवल रणभूमि में ही नहीं, बल्कि विद्यालयों की कक्षाओं में भी होता है। एक ओर वीर सैनिक अपने साहस, त्याग और बलिदान से राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे शिक्षण संस्थान ज्ञान, संस्कार, चरित्र और राष्ट्रीय चेतना से सशक्त नागरिक तैयार कर राष्ट्र के भविष्य की रक्षा करते हैं। दोनों ही राष्ट्र सेवा के समान रूप से पूजनीय स्तंभ हैं। श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल से माता हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल और फिर डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल तक की यह यात्रा केवल संस्थानों के नाम बदलने की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे संकल्प की अमर गाथा है जिसने विभाजन की पीड़ा को भी शिक्षा की शक्ति में बदल दिया। यह विरासत आज भी हजारों विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर रही है और यह संदेश दे रही है कि शिक्षा का प्रकाश किसी सीमा, किसी विभाजन और किसी परिस्थिति का मोहताज नहीं होता। आज जब भारत अपने वीरों के बलिदान और राष्ट्र की एकता का गौरवगान करता है, तब यह शैक्षिक विरासत भी उतनी ही श्रद्धा की अधिकारी है। यह हमें विश्वास दिलाती है कि देशों की सीमाएँ बदल सकती हैं, नक्शे बदल सकते हैं, लेकिन शिक्षा, सेवा, संस्कार और राष्ट्र निर्माण का सपना कभी नहीं बदलता। यही श्री: हरकौर गर्ल्स हाई स्कूल से डॉ. एम.के.के. आर्य मॉडल स्कूल तक की अमर विरासत का सबसे बड़ा संदेश और सबसे बड़ा गौरव है।

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